बरेली – भारतीय न्याय व्यवस्था की धीमी और कई बार असंवेदनशील कार्यप्रणाली का एक और उदाहरण सामने आया है। बरेली सेंट्रल जेल से 25 साल बाद आज़ाद ख़ान नामक एक व्यक्ति की रिहाई हुई है, जिसने यह साबित कर दिया कि न्याय में देरी कई बार जीवनभर की सज़ा बन जाती है। वर्ष 2000 में मैनपुरी जिले में हुई एक डकैती की वारदात में बिना किसी ठोस सबूत के गिरफ्तार किए गए आज़ाद ख़ान को 2003 में उम्रकैद की सजा सुना दी गई थी, जबकि न तो कोई प्रत्यक्षदर्शी था, न कोई फोरेंसिक प्रमाण और न ही उसकी स्पष्ट पहचान कराई गई थी। आर्थिक रूप से कमजोर होने के कारण वह समय पर अपील नहीं कर सका और लगभग ढाई दशक तक जेल में बंद रहा।
करीब 25 वर्षों बाद दिसंबर 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मामले की दोबारा सुनवाई करते हुए पुलिस जांच को कमजोर और आरोपों को अप्रमाणित मानते हुए आज़ाद ख़ान को पूरी तरह बेगुनाह करार दिया। हालांकि, अदालत से बरी होने के बावजूद प्रशासनिक लापरवाही और 7,000 रुपये के पुराने जुर्माने के चलते उसकी रिहाई में और देरी हुई। अंततः एक सामाजिक संस्था की मदद से जुर्माना अदा किया गया और 23 जनवरी को आज़ाद जेल से बाहर आ सका।
आज़ाद की रिहाई केवल एक व्यक्ति की आज़ादी नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें ग़रीब और कमजोर वर्ग के लोगों को न समय पर कानूनी सहायता मिलती है और न ही शीघ्र न्याय। उसके परिवार ने वर्षों तक गरीबी, सामाजिक तिरस्कार और मानसिक पीड़ा झेली। आज़ाद ख़ान की कहानी यह सोचने पर मजबूर करती है कि यदि न्याय प्रक्रिया में सुधार नहीं हुआ तो ऐसे कई और निर्दोष लोग सिस्टम की चक्की में पिसते रहेंगे।


