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जौ से लेकर स्मार्ट पशुपालन तक, पंत विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के तीन बड़े नवाचार

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पंतनगर – जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण नवाचार किए हैं। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड की पहली छिलका रहित जौ की प्रजाति ‘पंत जौ-11211’ विकसित की है। खास बात यह है कि केंद्र सरकार की सेंटर वैरायटी रिलीज कमेटी ने बीते अगस्त में इस प्रजाति को देश के उत्तर पूर्वी जोन के 12 राज्यों में उगाने के लिए जारी किया है।

वैज्ञानिकों के अनुसार छिलका रहित जौ को सीधे खाद्य उपयोग में लाया जा सकता है, जबकि सामान्य जौ में छिलका होने के कारण उसे उपयोग में लेने से पहले प्रोसेसिंग की आवश्यकता होती है। किसान मेले में विश्वविद्यालय के नवाचार स्टॉल पर छिलका रहित जौ को देखने और इसके बारे में जानकारी लेने के लिए किसानों की भीड़ उमड़ रही है।

मधुमेह रोगियों के लिए उपयोगी बताई जा रही प्रजाति

छिलका रहित जौ के प्रजनक एवं कृषि महाविद्यालय के आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभागाध्यक्ष डॉ. जेपी जायसवाल और डॉ. स्वाति ने बताया कि पंत जौ-11211 की प्रमुख विशेषताओं में इसका कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स और बीटा ग्लूकन की अधिक मात्रा शामिल है।

वैज्ञानिकों के अनुसार इस जौ का ग्लाइसेमिक इंडेक्स 20 से 28 के बीच है, जबकि गेहूं का ग्लाइसेमिक इंडेक्स करीब 60 से 70 बताया गया है। इसमें बीटा ग्लूकन की मात्रा 5 से 10 ग्राम प्रति 100 ग्राम तक पाई जाती है। इन्हीं विशेषताओं के कारण वैज्ञानिक इसे मधुमेह रोगियों के लिए उपयोगी खाद्य विकल्प के रूप में देख रहे हैं।

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मेले में किसानों को इसके कुछ बीज भी उपलब्ध कराए गए हैं। बीज को लेकर किसानों में उत्साह और मांग को देखते हुए विश्वविद्यालय में इसका वृहद स्तर पर बीज उत्पादन करने की तैयारी की जा रही है, ताकि आने वाले किसान मेलों और खेती के लिए किसानों को उनकी मांग के अनुरूप बीज उपलब्ध कराया जा सके।

125 से 135 दिन में तैयार होती है फसल

डॉ. जायसवाल के अनुसार पंत जौ-11211 की फसल अवधि 125 से 135 दिन है। पौधे की प्रकृति मजबूत है और यह गिरने के प्रति काफी सहनशील बताई गई है। यह प्रजाति पीला रतुआ और झुलसा रोग जैसी बीमारियों के प्रति भी रोधी है।

इसमें आयरन, कैल्शियम, जिंक, मैंगनीज, मैग्नीशियम, कॉपर, सेलेनियम और पोटैशियम जैसे विभिन्न पोषक तत्व पाए जाते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इसमें बीटा ग्लूकन की प्रचुरता होने के साथ पोषक तत्वों के संरक्षण की विशेषता भी है।


मोरिंगा-तुलसी से तैयार किया हर्बल कोम्बुचा

फर्मेंटेशन तकनीक से तैयार पेय, पारंपरिक भारतीय वनस्पतियों और आधुनिक खाद्य प्रसंस्करण का संगम

किसान मेले में मोरिंगा-तुलसी कोम्बुचा भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय के प्रौद्योगिकी महाविद्यालय के पोस्ट हार्वेस्ट प्रोसेसिंग एंड फूड इंजीनियरिंग विभागाध्यक्ष डॉ. पीके ओमरे और डॉ. सचिन कुमार के मार्गदर्शन में एमटेक छात्र शिवांक भारद्वाज ने यह अभिनव फर्मेंटेड हर्बल पेय तैयार किया है।

शिवांक ने बताया कि यह पेय मोरिंगा यानी सहजन की पत्तियों, तुलसी, चाय, चीनी और स्कोबी की सहायता से किण्वन प्रक्रिया द्वारा तैयार किया जाता है। स्कोबी बैक्टीरिया और यीस्ट की सहजीवी संस्कृति होती है।

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उनके अनुसार मोरिंगा और तुलसी में प्राकृतिक रूप से विभिन्न पौध-आधारित जैव सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं। इन पारंपरिक वनस्पतियों को फर्मेंटेशन तकनीक से जोड़कर एक नया पेय विकल्प विकसित करने का प्रयास किया गया है।

वैज्ञानिकों के अनुसार यह उत्पाद सामान्य मीठे पेय और कार्बोनेटेड शीतल पेय के मुकाबले हर्बल एवं फर्मेंटेड पेय विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसके पोषण, गुणवत्ता और उपभोक्ता स्वीकार्यता का आगे परीक्षण किया जा सकता है।


पशुपालन को स्मार्ट बनाएगा ‘पीएलएफ’ एप

सेंसर, जीपीएस, एआई और एनालिटिक्स के जरिए पशुओं की सेहत और व्यवहार पर रखी जाएगी नजर

बदलते दौर में पशुपालन को वैज्ञानिक और तकनीकी तरीके से करने की जरूरत को देखते हुए जीबी पंत कृषि विश्वविद्यालय के प्रौद्योगिकी महाविद्यालय के कंप्यूटर इंजीनियरिंग विभाग के शोधार्थियों ने प्रिसीजन लाइवस्टॉक फार्मिंग (पीएलएफ) एप विकसित किया है।

विभागाध्यक्ष डॉ. एसडी सामंतरे के मार्गदर्शन में तैयार इस तकनीक के माध्यम से पशुओं की सेहत, भोजन, गतिविधियों और व्यवहार पर डिजिटल माध्यम से निगरानी रखी जा सकती है।

किसान मेले में विश्वविद्यालय के स्टॉल पर एप की जानकारी देते हुए एमसीए छात्रा सुप्रिया पाठक और अन्य शोधार्थियों ने बताया कि पीएलएफ में जीपीएस ट्रैकर और विभिन्न सेंसर का इस्तेमाल किया जाता है। इनके माध्यम से मवेशियों की लोकेशन, मूवमेंट और स्वास्थ्य संबंधी गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है।

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बीमारी की जल्द पहचान में मिलेगी मदद

पीएलएफ प्रणाली में तापमान सेंसर, हार्ट सेंसर और मूवमेंट सेंसर जैसे उपकरणों का इस्तेमाल किया जा सकता है। इनसे प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण कर पशुओं की सेहत और व्यवहार में होने वाले बदलावों का पता लगाया जा सकता है।

इसके अलावा एआई और डेटा एनालिटिक्स की मदद से यह समझने में सहायता मिल सकती है कि किसी पशु को किस प्रकार की आवश्यकता है। बीमारी के शुरुआती लक्षणों की पहचान होने पर समय रहते उपचार और अन्य आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।

डॉ. सामंतरे के अनुसार पीएलएफ की प्रमुख विशेषताओं में सटीक डेटा आधारित प्रबंधन, सेंसर आधारित निरंतर निगरानी, एआई एवं एनालिटिक्स से विश्लेषण, बीमारियों की शीघ्र पहचान, बेहतर प्रबंधन और समय पर निर्णय शामिल हैं। इससे उत्पादन बढ़ाने और पशुपालन की लागत कम करने में भी मदद मिल सकती है।

भविष्य में नेशनल डिजिटल लाइवस्टॉक मिशन से जोड़ने की तैयारी

डॉ. सामंतरे ने बताया कि भविष्य में इस प्रणाली को आईओटी सेंसर और पीएलएफ तकनीकों से जोड़ा जा सकता है। एप को इस तरह डिजाइन किया गया है कि आगे चलकर इसे भारत सरकार के नेशनल डिजिटल लाइवस्टॉक मिशन से जोड़ने की संभावनाएं भी बनी रहें।

उन्होंने कहा कि डिजिटल तकनीक, सेंसर और एआई के इस्तेमाल से पशुपालन को अधिक व्यवस्थित और वैज्ञानिक बनाने की दिशा में यह पहल महत्वपूर्ण हो सकती है। विश्वविद्यालय के किसान मेले में प्रदर्शित ये नवाचार किसानों के बीच चर्चा का विषय बने हुए हैं।