अल्मोड़ा। थराली और धराली में आई आपदा के बाद पहाड़ी क्षेत्रों में संभावित प्राकृतिक खतरों को लेकर उत्तराखंड राज्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (यूकॉस्ट) और अल्मोड़ा जिला प्रशासन ने जिले का विस्तृत भूगर्भीय सर्वेक्षण शुरू कर दिया है। वैज्ञानिक दल भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों, नदियों के आसपास बसे इलाकों और धरातलीय परिस्थितियों का वैज्ञानिक अध्ययन कर रहा है। प्रदेश में इस विशेष अध्ययन के लिए अल्मोड़ा जिले को चुना गया है।
परियोजना के समन्वयक एवं यूकॉस्ट के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. नवीन चंद्र जोशी ने बताया कि नेपाल में आई हालिया त्रासदी के बाद इस अध्ययन की उपयोगिता और बढ़ गई है। परियोजना के पहले चरण में रामगंगा, कोसी और उनकी सहायक नदियों के किनारे स्थित भवनों एवं अन्य संरचनाओं की जीआईएस तकनीक से जियो-टैगिंग की जा चुकी है। इन्हें हालिया बाढ़ मैदान (आरएफपी) और पुराने बाढ़ मैदान (टी-1) के आधार पर चिह्नित किया गया है।
रामगंगा किनारे 801 संरचनाएं टी-1 जोन में
प्रारंभिक अध्ययन में रामगंगा नदी के हालिया बाढ़ मैदान यानी आरएफपी क्षेत्र में 91, जबकि पुराने बाढ़ मैदान यानी टी-1 क्षेत्र में 801 संरचनाएं चिन्हित की गई हैं। जोखिम आकलन में इनमें 233 संरचनाएं उच्च जोखिम और 568 मध्यम जोखिम श्रेणी में पाई गई हैं।

वहीं कोसी नदी के आरएफपी क्षेत्र में 15 और टी-1 क्षेत्र में 441 संरचनाएं चिन्हित की गई हैं। इनमें 23 संरचनाएं उच्च और 418 मध्यम जोखिम श्रेणी में हैं। इसके अलावा गगास नदी के आरएफपी क्षेत्र में 40 और साई नदी के आरएफपी क्षेत्र में 11 संरचनाएं भी दर्ज की गई हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार ये आंकड़े नदी के सक्रिय चैनलों और बाढ़ मैदानों के नजदीक बसी आबादी तथा बुनियादी ढांचे की संवेदनशीलता को सामने लाते हैं। इससे भविष्य में नदी किनारे निर्माण और विकास गतिविधियों के नियमन के लिए वैज्ञानिक आधार तैयार होगा।
अब मौके पर जाकर होगी ग्राउंड ट्रूथिंग
परियोजना के दूसरे चरण में वैज्ञानिक दल जीआईएस से चिह्नित संवेदनशील क्षेत्रों में मौके पर जाकर ग्राउंड ट्रूथिंग करेगा। इसके तहत यह सत्यापित किया जाएगा कि मानचित्रों में संभावित खतरे वाले क्षेत्र के रूप में चिह्नित स्थानों की वास्तविक स्थिति क्या है। साथ ही नदी किनारे बसी मानव बस्तियों के जोखिम का विस्तृत आकलन भी किया जाएगा।
भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों का भी वैज्ञानिक अध्ययन होगा। वैज्ञानिक दल भूस्खलन के मूल कारणों का पता लगाने के लिए भूगर्भीय परिस्थितियों, भूमि की स्थिति और अन्य संभावित कारकों का विश्लेषण करेगा। इसका उद्देश्य केवल खतरे को चिन्हित करना ही नहीं, बल्कि उसके दीर्घकालिक समाधान के लिए वैज्ञानिक आधार तैयार करना भी है।
सर्वे के बाद लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम
यूकॉस्ट के महानिदेशक प्रो. दुर्गेश पंत ने कहा कि अल्मोड़ा में अध्ययन सफल रहने के बाद इसी तरह का सर्वेक्षण पूरे उत्तराखंड में किए जाने की योजना है। प्राकृतिक आपदाओं के संभावित प्रभाव को कम करने के लिए वैज्ञानिक अध्ययनों और तकनीक आधारित निगरानी को बढ़ावा दिया जा रहा है।
सर्वेक्षण के बाद तैयार विस्तृत रिपोर्ट जिला प्रशासन को सौंपी जाएगी। संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की भी योजना है। इसके माध्यम से पहाड़ खिसकने या अन्य प्राकृतिक खतरे की आशंका होने पर लोगों को समय रहते चेतावनी देने में मदद मिलेगी।
परियोजना के तहत तैयार मानचित्र और स्थानीय डेटाबेस का इस्तेमाल संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण गतिविधियों के नियमन, जल निकासी व्यवस्था में सुधार, नदी कटाव वाले क्षेत्रों की निगरानी और आपदा प्रबंधन की रणनीति तैयार करने में किया जा सकेगा।

