रुद्रपुर – उत्तराखंड के रुद्रपुर स्थित रवींद्रनाथ टैगोर पार्क में विश्व हिंदू बंगाली एकता मंच के नेतृत्व में चल रहे “आरक्षण हमारा अधिकार” आंदोलन ने रविवार को अपने संघर्ष के लगातार 60 दिन पूरे कर लिए। इस अवसर पर बंगाली समाज के सैकड़ों युवा, महिलाएं, वरिष्ठ नागरिक तथा विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि धरनास्थल पर एकत्र हुए और आंदोलन के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सुब्रत कुमार विश्वास के नेतृत्व में आयोजित रक्त-हस्ताक्षर अभियान के दौरान युवाओं ने अपने रक्त से हस्ताक्षर कर भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री तथा उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, तेलंगाना, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और झारखंड के मुख्यमंत्रियों को संबोधित ज्ञापन प्रेषित किए।
ज्ञापन में पुनर्वासित बंगाली समाज की वर्षों से लंबित मांगों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाते हुए शीघ्र न्याय की मांग की गई। आंदोलनकारियों ने कहा कि यह किसी एक राज्य या संगठन का आंदोलन नहीं, बल्कि पूरे देश में बसे पुनर्वासित बंगाली समाज के सम्मान, संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और पहचान की लड़ाई है।

धरनास्थल पर आयोजित सभा को संबोधित करते हुए आंदोलन के संयोजक सुब्रत कुमार विश्वास ने कहा कि पिछले 60 दिनों से समाज के युवा पूरी निष्ठा, अनुशासन और शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन चला रहे हैं। उन्होंने कहा कि विभिन्न कठिन परिस्थितियों, प्रशासनिक दबाव और चुनौतियों के बावजूद आंदोलन का उत्साह कम नहीं हुआ है। बंगाली समाज संविधान के दायरे में रहकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा है और जब तक न्याय नहीं मिलेगा, तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा।
उन्होंने रक्त-हस्ताक्षर अभियान को आंदोलन का ऐतिहासिक चरण बताते हुए कहा कि वर्षों तक ज्ञापन, धरना और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के बावजूद समस्याओं का समाधान नहीं होने पर समाज को अपनी पीड़ा सरकार तक प्रभावी ढंग से पहुंचाने के लिए यह प्रतीकात्मक कदम उठाना पड़ा है। उन्होंने कहा कि युवाओं के रक्त की प्रत्येक बूंद समाज के सम्मान, समान अधिकार और आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए समर्पित है।
सभा में बंगाली समाज की प्रमुख मांगों को दोहराते हुए कहा गया कि पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा और मेघालय की तर्ज पर पूरे भारत में पुनर्वासित बंगाली समाज को “एक देश-एक कानून” के सिद्धांत के तहत अनुसूचित जाति (एससी) का दर्जा दिया जाए। वक्ताओं का कहना था कि एक ही समुदाय को अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग संवैधानिक दर्जा मिलना समानता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है।
इसके साथ ही लंबे समय से भूमि आवंटन से वंचित पुनर्वासित परिवारों को भूमि का वैधानिक आवंटन, कब्जे वाली भूमि पर स्वामित्व अधिकार और स्थायी पट्टा प्रदान करने की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई। आंदोलनकारियों ने पूरे देश में एक समान, पारदर्शी एवं ऑनलाइन जाति प्रमाण-पत्र व्यवस्था लागू करने की मांग करते हुए कहा कि अलग-अलग राज्यों की व्यवस्थाओं के कारण समाज के लोगों को अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
सभा में यह भी मांग की गई कि जिन क्षेत्रों में बंगाली समाज की पर्याप्त आबादी निवास करती है, वहां के सरकारी विद्यालयों में बांग्ला भाषा की शिक्षा प्रारंभ की जाए। वक्ताओं ने कहा कि मातृभाषा किसी भी समाज की संस्कृति, इतिहास और पहचान का आधार होती है, इसलिए उसे शिक्षा व्यवस्था में उचित स्थान मिलना चाहिए।
युवा नेता संजय ने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार ने शीघ्र ही समाज की मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया तो आंदोलन को अगले चरण में ले जाया जाएगा। उन्होंने कहा कि पहले क्रमिक अनशन और आवश्यकता पड़ने पर आमरण अनशन भी शुरू किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आंदोलन किसी सरकार या राजनीतिक दल के विरोध का नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों की प्राप्ति का आंदोलन है।
कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि यह संघर्ष केवल वर्तमान पीढ़ी का नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सम्मान, शिक्षा, रोजगार, भूमि अधिकार और सामाजिक न्याय को सुरक्षित करने की लड़ाई है। उन्होंने केंद्र एवं राज्य सरकारों से समाज की मांगों पर गंभीरता से विचार कर शीघ्र सकारात्मक निर्णय लेने की अपील की।
इस अवसर पर कांग्रेस नेता उत्तम आचार्य, पूर्व प्रत्याशी मोहन खेड़ा, संजय, अमित कुमार, विकास विश्वास, पवित्र सील, सुब्रतन कुमार, नितिन विश्वास, गौरांग सरकार, तरुण विश्वास, विद्युत मंडल, सिद्धार्थ, सुभाष राय, धीरज विश्वास, डॉ. शुभ्रो चक्रवर्ती, राजू विश्वास, अभिमन्यु क्षण, अमित मंडल, रंजीत कुमार मंडल, इंद्रजीत, पंकज राय, सुरेश विश्वास, विद्युत राय सहित बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ता, युवा और वरिष्ठजन उपस्थित रहे तथा रक्त-हस्ताक्षर अभियान में सहभागिता निभाई।
कार्यक्रम के समापन पर सभी उपस्थित लोगों ने एक स्वर में संकल्प लिया कि जब तक पुनर्वासित बंगाली समाज को उसके संवैधानिक अधिकार, अनुसूचित जाति का दर्जा, भूमि अधिकार, समान पहचान, मातृभाषा का अधिकार और सामाजिक न्याय प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक “आरक्षण हमारा अधिकार” आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से जारी रहेगा। आंदोलनकारियों ने विश्वास व्यक्त किया कि उनका यह संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों, सम्मान और सुरक्षित भविष्य की मजबूत नींव बनेगा।

