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हिमनद झीलों की निगरानी से लेकर बचाव तक, नैनीताल में तैयार होगी आपदा प्रबंधन की रणनीति

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नैनीताल – हिमालयी क्षेत्रों में हिमनद झीलों के फटने से उत्पन्न होने वाली संभावित आपदाओं और उनसे निपटने की तैयारियों को लेकर नैनीताल स्थित डॉ. आरएस टोलिया उत्तराखंड प्रशासनिक अकादमी में महत्वपूर्ण कार्यशाला आयोजित की गई। अकादमी के महानिदेशक वीपी पांडे के दिशा-निर्देशों के क्रम में आयोजित इस कार्यशाला में विशेषज्ञों ने ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) से जुड़े खतरों, वैज्ञानिक अध्ययन, जोखिम आकलन, निगरानी व्यवस्था और पूर्व चेतावनी प्रणाली विकसित करने पर विस्तार से चर्चा की। कार्यशाला में विभिन्न विभागों और संस्थानों के 120 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

कार्यशाला का शुभारंभ अपर सचिव, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग प्रकाश चन्द्रा ने मुख्य अतिथि के रूप में किया। इस अवसर पर राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए), नई दिल्ली के मेजर जनरल सुधीर बहल, पद्मश्री डॉ. शेखर पाठक, पद्मश्री अनूप साह तथा अकादमी के संयुक्त निदेशक डॉ. महेश कुमार विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहे।

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संयुक्त निदेशक डॉ. महेश कुमार ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा और हालिया प्राकृतिक आपदाओं से सबक लेते हुए भविष्य के खतरों से निपटने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, बेहतर विभागीय समन्वय और प्रभावी रणनीति विकसित करना बेहद जरूरी है।

संवेदनशील झीलों पर नजर और अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित करने पर जोर

मुख्य अतिथि प्रकाश चन्द्रा ने हिमनद झीलों से उत्पन्न संभावित खतरों से निपटने के लिए शासन स्तर पर किए जा रहे प्रयासों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि विभिन्न हिमनद झीलों का वैज्ञानिक अध्ययन और जोखिम आकलन किया जा रहा है। संवेदनशील क्षेत्रों में अर्ली वार्निंग सिस्टम यानी पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आपदा से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए समय रहते खतरे की पहचान और प्रभावी तैयारी आवश्यक है।

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एनडीएमए के मेजर जनरल सुधीर बहल ने हिमनद झीलों से उत्पन्न खतरों और उनके प्रबंधन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने सिक्किम में हिमनद झील फटने से आई आपदा के अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि ऐसी परिस्थितियों में समय पर चेतावनी, त्वरित प्रतिक्रिया और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल बेहद महत्वपूर्ण है।

पद्मश्री डॉ. शेखर पाठक और पद्मश्री अनूप साह ने भी हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता तथा प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने के लिए समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर अपने विचार रखे।

वैज्ञानिक अध्ययन और निगरानी को बताया आपदा प्रबंधन की अहम कड़ी

कार्यशाला के प्रथम तकनीकी सत्र में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत चर्चा हुई। इसमें वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान देहरादून के डॉ. डीपी डोभाल और डॉ. जयराम, आईसीआई, एमओडी नेपाल के डॉ. फारूख आजम, सेवानिवृत्त एडीजीएम डॉ. आनंद शर्मा, डॉ. आरके श्रीवास्तव, जीबी पंत विश्वविद्यालय पंतनगर, कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल के भू-विज्ञान विभागाध्यक्ष प्रो. राजीव उपाध्याय, यूएसडीएमए देहरादून के जीआईएस विशेषज्ञ रोहित कुमार, आईआईआरएस देहरादून के डॉ. हरीश कर्नाटक, सीबीआरआई रुड़की के डॉ. राजेश दास और डॉ. एनएल ठकुराल सहित विभिन्न संस्थानों के विशेषज्ञों ने प्रतिभाग किया।

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विशेषज्ञों ने हिमनद झीलों की पहचान और नियमित निगरानी, संवेदनशील क्षेत्रों का वैज्ञानिक आकलन, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव तथा संभावित आपदा के खतरों की पूर्व पहचान जैसे विषयों पर जानकारी साझा की। उन्होंने आपदा की स्थिति में त्वरित कार्रवाई, प्रभावी सूचना तंत्र और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय को मजबूत बनाने की जरूरत भी बताई।

कार्यशाला का संचालन कार्यक्रम निदेशक डॉ. मंजू पांडे ने किया। इस अवसर पर अकादमी के वीके सिंह, रिचांशु शर्मा, पूनम पाठक, पूनम पंत, डॉ. अनिल मिश्रा, नायक एवं समन्वयक डॉ. ओमप्रकाश सहित अन्य अधिकारी और कर्मचारी उपस्थित रहे।